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Wednesday, 7 September 2016

न सर पे ताज (ग़ज़ल) -ज़ुहैबुद्दीन

न सर पे ताज-ए-फज़ीलत न शान बाक़ी है
कहूँ मैं किससे कि मुझमे भी जान बाक़ी है

किसी भी हाल में मंज़िल से दिल नहीं बहला
अभी निगाह में शायद उड़ान बाक़ी है

पड़ा जो वक़्त तो तिनके को तीर कर लूँगा
अभी तो हाथ में मेरे कमान बाक़ी है


                                                     picture credit :trans4mind.com

 बहुत ग़ुरूर है तुझको खला नवर्दी पर

नज़र उठा के अभी आसमान बाक़ी है

बचा के हिस्से का अपने सफ़र में रखता हूँ
मैं जानता हूँ मेरी दास्तान बाक़ी है

दिए हैं ज़ख्म बहुत तूने बारहा लेकिन

ऐ जिंदगी तेरा अब भी लगान बाक़ी है

-ज़ुहैबुद्दीन चौधरी 


                                                                 ज़ुहैबुद्दीन चौधरी 
                                                              शिक्षक, हिंदी विभाग
                                                जामिया मिलिया इस्लामिया (नई दिल्ली) 

Monday, 30 May 2016

ये कैसी आज़ादी है? -हसन चौधरी

देश में अब बर्बादी है
ये कैसी आज़ादी है

क्या सपने उनके झूठे थे
जो आज़ादी पर मर मिटे थे
स्वयं हिंसा करते फिरते हैं
फिर कहते गांधीवादी है

देश में अब बर्बादी है
ये कैसी आज़ादी है

अब अश्रुधारा बहती है
पल पल मुझसे कहती है
इस देश को तुमने दिया है क्या?
इस देश का तुमने किया है क्या?
तुम आज़ादी का हक़ क्या जानो
भ्रष्टाचारों, अपराधों से
देश की नाक कटा दी है



देश में अब बर्बादी है
ये कैसी आज़ादी है

आओ फिर वो देश बनाएँ
भ्रष्ठाचार को मिल के मिटाये
आओ शहीदों के सपनों को
मिल मिल कर साकार बनायें

लगे देश में अब आज़ादी है
लगे देश में हाँ आज़ादी है

-हसन चौधरी

हसन चौधरी जामिया मिल्लिया इस्लामिया में बी० ए० हिंदी (ऑ) के छात्र है।

Wednesday, 18 May 2016

पुरस्कार नहीं चाहूँगा (कविता) -अबुज़ैद अंसारी

प्रज्वलित होता दीपक हूँ 
शांति प्रकाश फैलाऊँगा
विकीर्ण होती अशांति पर 
नीर बन गिर जाऊंगाछिन्न पत्र में फिर से मैं हरित क्रांति लाऊँगा

कृत्यों पर कोई पुरस्कार दे
पुरस्कार नहीं चाहूँगा

अविराम शांति विकीर्ण हो
गर्व से सिर उठा,
निर्भीक हो
पृथ्वी से व्योम तक
शांति प्रकाश फैलाऊँगा

कृत्यों पर कोई पुरस्कार दे
पुरस्कार नहीं चाहूँगा

पथ पर शूल हों
वायु में चिंगारियां
जल का सैलाब हो
हिमाद्रि सी पहाड़ियाँ
मूक होकर लक्ष्य को
स्वयं भेद जाऊँगा


कृत्यों पर कोई पुरस्कार दे
पुरस्कार नहीं चाहूँगा

-अबुज़ैद अंसारी


अबुज़ैद अंसारी जामिया मिल्लिया इस्लामिया (नई दिल्ली) में जनसंचार मीडिया / पत्रकारिता के छात्र हैं। आप जीवनमैग के सह -संपादक हैं, और नवाबों के शहर लखनऊ से ताल्लुक़ रखते हैं। 

Monday, 16 May 2016

हिन्द का कलाम (नज़्म) -अबुज़ैद अंसारी

मर कर नहीं मरा वो इस हिन्द का ग़ुलाम
ज़िंदा अभी दिलों में है हिन्द का कलाम

छोटी सी झोपड़ी में चमका वो दीप बनकर

या था कोई सितारा रामेश्वर के ऊपर


उसने किया जहाँ में ऊँचा वतन का नाम

ज़िंदा अभी दिलों में है हिन्द का कलाम


फोटो क्रेडिट: सुहैब, कक्षा 7, ब्रेन्स कान्वेंट स्कूल -लखनऊ

वो एक कुआँ है जिससे सेराब होंगी सदियाँ
जिससे बहेंगी हर सू इल्मों हुनर की नदियां

वो अम्न का सिपाही, अम्न था पैग़ाम
ज़िंदा अभी दिलों में है हिन्द का ग़ुलाम



अबुज़ैद अंसारी जामिया मिल्लिया इस्लामिया (नई दिल्ली) में जनसंचार मीडिया / पत्रकारिता के छात्र हैं। आप जीवनमैग के सह -संपादक हैं, और नवाबों के शहर लखनऊ से ताल्लुक़ रखते हैं। 

Thursday, 12 May 2016

The Inner Voice (Poem) -Wasim Ahmad Alimi

I am here , but my heart is somewhere
The time is too difficult without you , to spare
If you don't mind , I would dare
To say " you are my love " please be aware .
O chaste ! When the splashes of thy love ,
are not on the surface of my heart ,

It is a ravaged and dreary desert .
I open my lips to say and blurt
I wanna peck a soft kiss on your smiling lips,
O my houris ! Be attentive and alert.
You are my love , you are my love .




Wasim Ahmad Alimi is from Urdu Department of Jamia Millia Islamia, New Delhi. He is a youth short- story writer and poet in both Urdu and English. He has also translated some literary books and stories.

Saturday, 7 May 2016

माँ और बचपन की याद (नज़्म)-वसीम अहमद अलिमि

मेरे बचपन का मुझे सारा ज़माना याद है।
माँ तेरी आग़ोश में वो मुस्कुराना याद है।

थपकियाँ देना तेरा लोरी सुनना याद है।
मेरी खुशियों के लिए वो गुनगुनाना याद है।

उँगलियों को थाम कर चलना सिखाना याद है।
माँ की ममता का मुझे सारा फ़साना याद है।

मेरी नन्ही आह पर आँखों का नम होना तेरा
मेरी राहत के लिए वो रात भर जगना तेरा


मुझको रोता देख कर दौड़े हुए आना तेरा
अपने आँचल के तले वो गोद में लेना तेरा

रात में जुगनू दिखा मुझको डराना याद है

माँ तेरी शफ़क़त का हर किस्सा फ़साना याद है।
ये जो मेरी ज़िन्दगी है, माँ का ही एहसान है।

माँ की अज़मत पर न्यौछावर ज़िन्दगी और जान है
-वसीम अहमद अलिमि

वसीम अहमद अलिमि जामिया मिल्लिया इस्लामिया में उर्दू विभाग से सम्बन्ध रखते हैं। आप युवा कथाकार तथा कवि है और कई अलग अलग साहित्यिक पुस्तकों के अनुवादक भी हैं।






Saturday, 12 March 2016

तुझे जाना बहुत दूर है (कविता) - अबुज़ैद अंसारी


हार कर तू हार को
क्यों अपनी हार मानता है।
बीच राह में क्यों ठिठक कर
लक्ष्यहीन हो तू खड़ा है।
लक्ष्य को आयाम दे
पंखों को उड़ान दे
तेरा लक्ष्य बहुत दूर
तुझे जाना बहुत दूर है।

उपवनों को देखकर
क्यों रुके तेरे क़दम
साथियों की महफ़िलों में
कहाँ खो गए पथिक तुम
हे ! पथिक चलो बढ़ो
लक्ष्य बहुत दूर है।
तेरा लक्ष्य बहुत दूर
तुझे जाना बहुत दूर है।



                                                        Photo credit: vandaelecapital.com

कंटकों का पथ है आगे
तम से ना डरो पथिक
तुम निरंतर बढ़ चलो
पर्वतों पर चढ़ चलो
तुम अजेय बनो पथिक
तुम बनो शूर
तेरा लक्ष्य बहुत दूर
तुझे जाना बहुत दूर है।

कल जो तुझमे लालसा थी
वह कहाँ गई पथिक
क्यों रुके तेरे क़दम
चल पड़ो  तुम हे ! पथिक
कंटकों से, उपवनों से
पर्वतों से आगे
लक्ष्य बहुत दूर है।
तेरा लक्ष्य बहुत दूर
तुझे जाना बहुत दूर है।

- अबुज़ैद अंसारी



अबुज़ैद अंसारी जामिया मिल्लिया इस्लामिया (नई दिल्ली) में जनसंचार मीडिया / पत्रकारिता के छात्र हैं। आप जीवनमैग के सह -संपादक हैं, और नवाबों के शहर लखनऊ से ताल्लुक़ रखते हैं। 


Friday, 11 December 2015

Silent Sorrow- Shadab Khan

Tonight,

as I stand in the middle of incomplete us,

I hear the leaves whisper;


They tell me about-

the million sunsets that faded

and the one that lived.


That one sunset in my heart,

which I have

lighted forever.



They tell me about-

How I've been burning in water and

How I never loved you,

drowning in flame.

I lived you.


And I stand there

moon collapse,

while the ocean stills and

into ten thousand fragments of me,

which you could never love;

Or, you just pretend not to?


and I, on our meeting ­bridge

Tonight,

"Only the moon

alone, growing cold"

by knowing-


Every me is longing you;

Longing us.


MD. SHADAB KHAN is pursuing his Bachelors degree in Business from Jamia Millia Islamia, New Delhi. He was India's youth ambassador to the United States on YES program of the US Department of State during the year 2013-14.

Tuesday, 7 April 2015

तराना-ए-विदाई : जामिया मिल्लिया इस्लामिया

जामिया स्कूल Jamia Schools
लिखने को आज ग़ज़ल ये
मेरे हाथ थरथराए 
कहने की बारी अलविदा 
आँखों में आंसू आये 

हम क़ाफ़िला थे अब तक 
क़तरा क़तरा थे समुन्दर 
अब टूट कर बिखर कर 
कल किस तरफ़ को जाएँ  

उस्तादों के हैं एहसान जो 
हम ना चुका सकेंगे 
ग़लती भी हो हमारी तो 
देते हैं ये दुआएंं 

है जामिया का आँगन 
मेरी माँ की गोद जैसा 
बचपन के दिन गुज़ारे 
और दोस्त भी बनाए 

रौशन शमा जो इल्म की 
इस जामिया से मिली 
इसको जलाये रखना 
ईमान-ए-हक़ बनाए 

है जामिया की अज़मत 
कंधों पे अब तुम्हारे 
आगे बढ़ोगे अब तुम 
रखना इसे बनाए 

मायूस कितना दिल है 
कि हम दूर हो रहें हैं 
ताउम्र हम रखेंगे 
यूँ दिल से दिल मिलाये 

बहुत खामोश रहता है 
मगर नादाँ नही है "ज़ैद" 
उसे आवाज़ बनना है 
जिसे सदियों सुना जाए 

अबूज़ैद अंसारी जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नयी दिल्ली में बारहवीं कक्षा के छात्र हैं. आप जीवन मैग के सह-संपादक हैं और नवाबों के शहर लखनऊ से ताल्लुक़ रखते हैं.

Saturday, 28 March 2015

स्वर्णिम बिहार

मौर्य-मगध का केंद्र-बिंदु हो,
क्रांति की अंगड़ाई हो। 

वर्तमान को दिया दिखाते,
स्वर्णिम भूत की परछाई हो।


भोज-अंग-मिथिला का स्वर हो,
वज्जी-मगही का तराना हो

'पञ्चबजना' की स्वरलहरी पर,
विद्यापति का गाना हो


जाट-जटिन का प्रेमनृत्य हो,
'कोहबर' की फूलकारी हो। 

'अरिपन' की तुम उज्जवल रचना,
'मधुबनी' की चित्रकारी हो


सारण के तुम रास-रंग हो,
चम्पारण की बुद्धि हो। 

शाहाबाद की तुम हो वीरता,
दरभंगा की विद्या हो


गंगा के तुम पावन जल हो,
कोसी-कमला के जाये हो। 

नारायणी की गोद में बैठे,
सुन्दर रूप बनाए हो


उदयिन-अशोक हैं पुत्र तुम्हारे,
सीता भी तो जाई है। 

गाँधी-बुद्ध आगंतुक तेरे,
महावीर के भाई हो


जी करता है जन्म-जन्म मैं,
गोद तुम्हारे हीं खेलूँ। 

भारतवर्ष का बेटा बनकर,
नाम "बिहारी" कहलाऊं । 


(फोटो क्रेडिट: बिहार ऑनलाइन)

अंकित कुंदन दुबे छात्र, स्वतंत्र टिप्पणीकार तथा जीवन मैग के टीम मेंबर हैं। आप पूर्वी चंपारण, बिहार से आते हैं और फेसबुक पर "आपन टिकुलिया" नामक ऑनलाइन ग्रामीण समुदाय के संचालक हैं। वर्तमान में पढाई के सिलसिले में नयी दिल्ली में प्रवास है।

Wednesday, 11 February 2015

गाँव: तब और अब


           एक 
तब गाँव हमारा ऐसा था

तब गाँव हमारा ऐसा था
इंसान जहाँ पर रहते थे

सब शत्रु थे एक-दूजे के
पर एक दूजे पर मरते थे

आदर था तब पंचों का
उपयोग नहीं तमंचों का

पंचायत के निर्णय का तब
मान बड़ा वो रखते थे

पर कई बार मनोरंजन खातिर
केस-मुकदमे लड़ते थे

एक नदी किनारे बहती थी
तहजीब यहाँ वह बसती थी

सब लड़के थे अपने घर के
पर बेटी पंच की होती थी

गईया को मईया कहते थे
बरगद को बाबा कहते थे

तब चाँद हमारा मामा था
और नदी हमारी माई थी

कुछ बेटों जैसे भाई थे
कुछ अम्मा सी भौजाई थीं

पुआल में घुस कर सोते थे
तब मिलती नहीं रजाई थी

एक-दूजे को वो हंसते थे
आपस में तंज वो कसते थे

पूरा गाँव रो पड़ता था
जब दुलहिन् बेटी रोती थी

तब प्यार में गाली देते थे
देवर भौजी के चहेते थे

नारी नर की परछाई थी
पर ननद बड़ी हरजाई थी

पोतों के कंधों पर जाऊं
हर दादी की अभिलाषा थी

सब पोते बड़े किसान बनें
यह दादाजी की आशा थी




दो
अब गाँव हमारा ऐसा है
अब गाँव हमारा ऐसा है
हर एक हाथ में पैसा है

ना कोई किसी का बैरी है
सब जैसे को तैसा है

काका-काकी चले गए
अब अंकल-आंटी आई है

वाईफ घर में घुस बैठी है
जब से गयी लुगाई है

अब चाँद हमारा मून हुआ
गईया बन गयी काऊ है

इन्सान की कीमत चली गयी है
जमीन बड़ी बिकाऊ है

अब जाते नहीं चौपालों में
गाँव के इन जंजालों में

लोग शहर को चले गए हैं
घर बसता है तालों में

शहरीकरण की परछाई है
सब चली गयी तरुणाई है

ढ़ोल-मंजीरे उठ गए कब के
डीजे की पुरवाई है

ना मिलते ना बतियाते हैं
ऐसी अब रुखाई है

दुबक पड़े इन्सान हैं घर में
जब से छतरी आई है

कुछ अनजाने से बच्चे हैं
स्कुल बसों में जाते हैं

कौन लगेगा चाचा-ताऊ
सामान्यज्ञान में कच्चे हैं

बदल गया अब गाँव ओ भईया
आई विकास की क्रांति है

शहरी दुलहा जब घुस आया
ससुराल चली अब 'शांति' है


अंकित कुंदन दुबे छात्र, स्वतंत्र टिप्पणीकार तथा जीवन मैग के टीम मेंबर हैं। आप पूर्वी चंपारण, बिहार से आते हैं और फेसबुक पर "आपन टिकुलिया" नामक ऑनलाइन ग्रामीण समुदाय के संचालक हैं। वर्तमान में पढाई के सिलसिले में नयी दिल्ली में प्रवास है।

Monday, 5 January 2015

ज़िंदगी गुलज़ार है- अमिनेष

ज़िंदगी गुलज़ार है।

तमाम उलझनों से।
परेशानियों से।
उन तन्हाइयों से।
खुशी और गम का व्यापार है।

ज़िंदगी गुलज़ार है।

अपनी हसरतों से।
दुनिया कि उम्मीदों से।
यादों की गलियों से।
मौन पहेलियों से।
हसीन सपनों का बाज़ार  है।

ज़िंदगी गुलज़ार है।

टूटते रिश्तों से।
रुठते फरिश्तो से।
गुमशुदा मंजिलो से।
बेज़ार है।
फिर भी जाने क्युँ;
यह दिल
जीने को बेकरार है।

ज़िंदगी गुलज़ार है। 



(अमिनेष आर्यन काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में राजनीतिशास्त्र स्नातक‍ प्रथम वर्ष के छात्र हैं। अमिनेष मूलरूप से बिहार के हाजीपुर से सम्बन्ध रखते हैं और जीवन मैग की संपादन समिति के सदस्य हैं।)

Roman Text




Zindagi Gulzaar hai


Tamaam uljhanon se.
pareshaniyon se.
un tanhaiyon se.
khushi aur gham ka vyaapaar hai.

Zindagi gulzaar hai

Apni hasraton se.
duniya ki ummedon se.
yaadon ki galiyon se.
maun paheliyon se.
haseen sapnon ka bazaar hai.


Tootte rishton se.
ruthte farishton se.
ghumshuda manzilon se.
bezaar hai.
fir bhi jaane kyun;
yeh dil
jeene ko bekarar hai.
Zindagi gulzaar hai



Aminesh Aryan  is an editorial board member at JeevanMag.com and a student of Political Science Honors. at the Banaras Hindu University. He comes from Vaishali in Bihar.

Tuesday, 23 December 2014

गुज़रे दिन (ग़ज़ल)- अबूज़ैद अंसारी

गुज़रते रंज में अफ़सोस में हैं ये सारे दिन

मुझे फिर याद आए हैं मुहब्बत के वो प्यारे दिन

वो तन्हाई में तुमको याद करना और रोना था

मेरी नज़रों का टकराना तेरा शर्मिंदा होना था

 
मुलाक़ातों पे एक दूजे से हम ना बोल पाते थे

हज़ारों लफ्ज़ आँखों से ही सुनते और सुनाते थे

नाज़ुक हाथ तेरा थाम कर चलता था राहों पर

ग़ुरूर खुद पर मैं था करता क़िस्मत आसमानों पर


मुझे याद आया वो दिन तूने जब साथ छोड़ा था

कहा मजबूर हूँ समझो ये कहकर हाथ छोड़ा था

कहाँ हो तुम चले आओ अधूरा हूँ मैं तेरे बिन

गुज़रते रंज में अफ़सोस में हैं ये सारे दिन 

 

अबूज़ैद अंसारी जामिया मिल्लिया इस्लामिया नयी दिल्ली में बारहवीं कक्षा के छात्र हैं. आप जीवन मैग के सह-संपादक हैं और नवाबों के शहर लखनऊ से ताल्लुक़ रखते हैं.



 Roman Text

Guzarte ranj me afsos me hain ye saare din
mujhe fir yaad aaye hain muhabbat ke wo pyaare din
wo tanhaai mein tumko yaad karna aur rona tha
meri nazron ka takrana tera sharminda hona tha

Mulakaton pe ek dooze se ham na bol paate the
hazaaron lafz aakhon se hi sunte aur sunate the
Najuk hath tera tham kar chalta tha rahon par
gurur khud par main tha karta kismat aasmanon par

Mujhe yaad aaya wo din tune jab sath chhoda tha
kaha majboor hoon samjho ye kahkar hath chhoda tha
kahan ho tum chale aao adhura hoon main tere bin
guzarte ranj me afsos me hain ye sare din

Thursday, 4 December 2014

विनम्रता (कविता)- नन्दलाल


विनीति नीति प्रीति की अजेय सनातन रीत है,
सुर असुर के फ़र्क में विनम्रता ही विपरीत है.

विनम्रता नहीं धूर्तता न इसमें अहं का दंश है,
यह आग्रह सत्य का परमात्मा का अंश है.

हित शत्रुओं के विनय ही खड्ग और ढाल है,
समुज्ज्वलित इसी में गांधी की मशाल है.

संग ढलते वय के अडिग दंत सब हिल गए हैं,
और खड़े ठूंठ तरु अंधड़ों में मिल गए हैं.

किंतु लचलचा जिह्वा करती सदा ही राज है,
और नत सफल दरख्तों के सर ही ताज है.

ज्ञान और मोक्ष की होती विनय से ही प्राप्ति है,
निहित इसी में सुख समृद्धि और ख्याति है.

अब जी रहा हूँ बस प्रभु मिलन के वास्ते ही,
हे प्रिय, ले चल मुझे विनय के रास्ते ही.


नन्दलाल मिश्र जीवन मैग के प्रबंध संपादक हैं। सम्प्रति आप दिल्ली विश्वविद्यालय के संकुल नवप्रवर्तन केन्द्र में मानविकी स्नातक के छात्र तथा दिल्ली विश्वविद्यालय सामुदायिक रेडियो के कार्यक्रम समन्वयक है। आप बिहार के समस्तीपुर से ताल्लुक रखते हैं।

Sunday, 30 November 2014

जो जहाँ से उठता है...(गुंजन श्री)

जो जहाँ से उठता है, वहीँ से टूट सकता है,
ज़रा बचके रहिये साहब, कोई भी लुट सकता है। 


बड़ा परेशां इन्सां है, अपने दिल की दुनिया से,
जो माने, मना लीजे, कोई भी छुट सकता है।

शिकस्त पाकर भी ख़ुश है, अजीब दुनियादारी है,
हार-जीत, हंसी-ख़ुशी, इनसे कोई भी रूठ सकता है...???



गुंजन श्री
युवा साहित्यकार
पटना (बिहार)

Friday, 14 November 2014

ग़ज़ल: एक दिन- राघव

ज़मीन-ओ-आसमां, और अपनी नज़रों का जहाँ

कर चलेंगे ये सभी तेरे हवाले एक दिन |

वो जो बाक़ी रह गया था रहज़नों से सफ़र में,

राह्बरों ने छीन लिए उनसे निवाले एक दिन |

इन परिंदों से कहो ये सच की धुन को ना कहें

कर के बदनां शज्र इनके लोग जलाएंगे एक दिन |

तुम ये चेहरा क्या दिखाते धूप में झुलसा हुआ?

तुमको दिखलाएंगे हम पैरों के छाले एक दिन |

डर नहीं ये मेरे दुश्मन क़त्ल को बेताब हैं

ग़म है मुझको मेरे अपने मिटाएंगे एक दिन |

आइनों को देख कर चेहरों को चमका लिया

आइनों पे दाग़ को अब मिटाएंगे एक दिन

अब भी खतरे में है सच, सुकरात अब भी मरते हैं

बदले में ये नादां, ज़हर पिलाएंगे एक दिन

ठोकरों से एक ना एक दिन हम संभलना सीख लेंगे,

कोई तो एक बार आकर , हमें संभाले एक दिन |

मैं हार तो गया हूँ पर जद्दोजहद पर अब भी हूँ

देखना दी जाएँगी 'राघव' की मिसालें एक दिन। 



राघवेन्द्र त्रिपाठी 'राघव'  
(लेखक जीवन मैग के संपादन समिति के सदस्य हैं। आप दिल्ली विश्वविद्यालय में बी.टेक/ बी.एस इन इनोवेशन विद मैथ्स एन्ड आइटी के छात्र हैं तथा ग़ज़ल में गहरी रूचि रखते हैं.)
(संपादन में अतिरिक्त प्रयत्न के लिए जीवनमैग के सह-संपादक अबूज़ैद अंसारी को धन्यवाद सहित)


 Roman Text: Ghazal- Ek Din

Zameen-o-asman aur apni nazron ka jahan
kar chalenge ye sabhi tere hawale ek din
wo jo baaki reh gaya tha rahjanon se safar me,
 rahbaron ne chheen liye unse niwale ek din
in parindon se kaho ye sach ki dhun ko naa kahen
kar ke badnan shazr inke log jalayenge ek din
tum ye chehra kya dikhate dhoop me jhulsa hua?
 tumko dikhayenge hum pairon ke chhale ek din
dar nahi ye mere dushman katl ko betaab hain
gham hai mujhko mere apne mitayenge ek din

aainon ko dekh kar chehron ko chamka liya
aainon pe daag ko ab mitayenge ek din
ab bhi khatre me hai sach, sukrat ab bhi marte hain
badle me ye naadan, zahar pilayenge ek din
thokron se ek naa ek din ham sambhalna seekh lenge
koyi to ek baar aakar, hamen sambhaale ek din
main haarf to gaya hoon par jaddojahad par ab bhi hoon
dekhna dee jayengi "raghav" ki misalen ek din

- Raghavendra Tripathi "Raghav"

A series of skype group conversations beetween students from India & Pakistan

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